Thursday, 13 March 2014

गीता-उपदेश

"सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोsपि स योगी मयि वर्तते ।।"
(गीता---6.31)

अन्वयः---यः एकत्वम् आस्थितः सर्वभूतस्थितम् माम् भजति सः योगी सर्वथा वर्तमानः अपि मयि वर्तते।।

अर्थः---प्राणि-मात्र को सुख-दुःख का अनुभव एक-सा होता है। इस एकता को जानकर जो मुझे प्राणी-मात्र की सेवा में उपस्थित समझकर मेरा भजन करता है अर्थात् मेरी अनुकरण रूप सच्ची सेवा करता है, वह योगी किसी अवस्था में भी क्यों न हो, वह मुझ पर आश्रित है, क्योंकि अनुकरण हू भक्ति का सच्चा चिह्न है।

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